
Price: ₹399.00
(as of May 28, 2025 07:48:38 UTC – Details)
Shri Vishnu Puran (श्री विष्णुपुराण) Code 1364 Published By Gita Press , Gorakhpur , Pages – 320 . MRP – 150 And Garud Puran (गरुड़पुराण) Code 1189 Published By Gita Press , Gorakhpur , Pages – 624 , MRP – 250 , ॥ श्रीहरिः ॥ निवेदन भारतीय संस्कृतिके मूलाधारके रूपमें वेदोंके अनन्तर पुराणोंका ही सम्मानपूर्ण स्थान है। वेदोंमें वर्णित अगम रहस्योंतक जन-सामान्यकी पहुँच नहीं हो पाती, परंतु भक्तिरससे ओतप्रोत पुराणोंकी ज्ञानप्रदायिनी दिव्य कथाओंका श्रवण-मनन तथा पठन-पाठन करके जन-साधारण भी भक्ति-तत्त्वका अनुपम रहस्य ही हृदयङ्गम कर लेते हैं। ब्रह्माजीने समस्त शास्त्रोंमें सर्वप्रथम पुराणोंका ही स्मरण किया। पीछे उनके मुखसे वेदोंका प्राकट्य हुआ। इसलिये पुराण भी वेदार्थ ही बोधक हैं। पुराणोंकी अनन्त ज्ञानराशिसे जन-जनको लाभान्वित करानेके उद्देश्यसे गीताप्रेस ‘कल्याण’ के माध्यमसे विशेषाङ्कोंके रूपमें समय-समयपर विभिन्न पुराणोंको प्रकाशित करता रहा है। उसी क्रममें ‘श्रीविष्णुपुराण’ का भी सानुवाद प्रकाशन किया गया था। हिन्दी-भाषा-भाषी पाठकोंकी सुविधाकी दृष्टिसे अब ‘श्रीविष्णुपुराण’ का केवल हिन्दी अनुवाद (मोटे टाइपमें) पाठकोंकी सेवामें प्रस्तुत किया जा रहा है। अष्टादश महापुराणोंकी श्रृंखलामें विष्णुपुराणका स्थान सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। यह वैष्णव दर्शन तथा वैष्णव भक्ति-उपासनाका मूलाधार है। विष्णुपरक होनेपर भी इसमें शिव भक्ति तथा शिव चरित्रकी पूर्ण प्रतिष्ठा हुई है । ऐतिहासिक घटना चक्रकी दृष्टिसे भी इस पुराणकी विशेष प्रधानता है। इस पुराणमें पुराणोंके पञ्चलक्षणोंका सम्यक् रूपसे परिपाक हुआ है। इसके प्रथम अंशमें विस्तारसे सृष्टिका वर्णन हुआ है। द्वितीय अंशमें भूगोल तथा खगोलका वर्णन है। तृतीय अंशमें मन्वन्तर, वेदकी शाखाओंका विस्तार, वर्णाश्रम धर्म तथा श्राद्धोंका निरूपण किया गया है। चतुर्थ अंशमें मुख्यरूपसे सूर्य तथा चन्द्रवंशके राजाओंके दिव्य आख्यान, कलियुगके राजवंशोंका वर्णन तथा कलियुगकी श्रेष्ठता प्रदर्शित की गयी है।नम्र निवेदन अठारह महापुराणोंमें ‘गरुडमहापुराण’ का अपना एक विशेष महत्त्व है। इसके अधिष्ठातृदेव भगवान् विष्णु हैं, अतः यह वैष्णव पुराण है। इसके माहात्म्यमें कहा गया है—’यथा सुराणां प्रवरो जनार्दनो यथायुधानां प्रवरः सुदर्शनम् । तथा पुराणेषु च गारुडं च मुख्यं तदाहुर्हरितत्त्वदर्शने ॥’ जैसे देवोंमें जनार्दन श्रेष्ठ हैं और आयुधों में सुदर्शनचक्र श्रेष्ठ है, वैसे ही पुराणोंमें यह गरुडपुराण हरिके तत्त्वनिरूपणमें मुख्य कहा गया है। जिस मनुष्यके हाथमें यह गरुडमहापुराण विद्यमान है, उसके हाथमें नीतियोंका कोश है। जो मनुष्य इस पुराणका पाठ करता है अथवा इसको सुनता है, वह भोग और मोक्ष- दोनोंको प्राप्त कर लेता है। यह पुराण मुख्यरूपसे पूर्वखण्ड (आचारकाण्ड), उत्तरखण्ड ( धर्मकाण्ड-प्रेतकल्प) और ब्रह्मकाण्ड–तीन खण्डोंमें विभक्त है। इसके पूर्वखण्ड (आचारकाण्ड)- में सृष्टिकी उत्पत्ति, ध्रुवचरित्र, द्वादश आदित्योंकी कथाएँ, सूर्य, चन्द्रादि ग्रहोंके मन्त्र, उपासनाविधि, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, सदाचारकी महिमा, यज्ञ, दान, तप, तीर्थसेवन तथा सत्कर्मानुष्ठानसे अनेक लौकिक और पारलौकिक फलोंका वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें व्याकरण, छन्द, स्वर, ज्योतिष, आयुर्वेद, रत्नसार, नीतिसार आदि विविध उपयोगी विषयोंका यथास्थान समावेश किया गया है। इसके उत्तरखण्डमें धर्मकाण्ड-प्रेतकल्पका विवेचन विशेष महत्त्वपूर्ण है। इसमें मरणासन्न व्यक्तिके कल्याणके लिये विविध दानोंका निरूपण किया गया है। मृत्युके बाद और्ध्वदैहिक संस्कार, पिण्डदान, श्राद्ध, सपिण्डीकरण, कर्मविपाक तथा पापोंके प्रायश्चित्तके विधान आदिका विस्तृत वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें पुरुषार्थचतुष्टय – धर्म,

